तराजू से कभी समन्दर नहीं तोला जाता,
दिलजलों से कभी प्यार नहीं किया जाता,
आ जाना कभी मेरी महफ़िल में वक्त निकलकर,
क्यों कि हवाओं में कभी इतिहास नहीं उकेरा जाता।
--सीरवी प्रकाश पंवार
सोमवार, 15 मई 2017
तराजू से कभी..
शनिवार, 13 मई 2017
भूल जाता हूँ...
भूल जाता हूँ अक़्सर ख़ुशी के पल तुझे पास देख कर,
सो जाता हूँ अक़्सर बिन नींद के तुझ पर सर रख कर,
जब तू हैं ही मेरे पास तो कोई और क्या वज़ूद रखता माँ,
भूल जाता हूँ साँसे हर रोज की अक़्सर तुझे गले लगा कर।
--सीरवी प्रकाश पंवार
Happy mother's day.
Love you amma and appa
शुक्रवार, 12 मई 2017
तेरे आँखों पर...
तेरे आँखों पर काली पट्टी बंधी हैं कैसे हटाऊँ मै इसे,
एक रूप गढ़ लिया हैं तेरे मन ने कैसे मिटाऊँ मै तुझे,
मुझे सलाखों पर चलाया और सलाखें पानी में थी,
पर वो पानी नहीं तेज़ाब था कैसे बताऊँ मै तुझे।
--सीरवी प्रकाश पंवार
गुरुवार, 11 मई 2017
अज़ीब हूँ..
उज्वल मन के तलवित रिश्तो की,
बागड़ोर तू संभाल कर रखना,
मै तो था अज़ीब, हूँ अज़ीब और
रहूंगा अज़ीब ही,
तू भी ज़रा अज़ीब बन जाना।
--सीरवी प्रकाश पंवार
बुधवार, 10 मई 2017
हलचल
देखों अपनी जमीं पर कुछ अज़ीब सी हलचल हुई हैं,
गोली हैं बन्दूक में फिर भी जमीं पर बिन टोपी
पड़ी हैं,
वो सरताज़ तप्त और हिम धरा पर क्या उम्मीद रखेंगा हमसे,
देखो आज रूह सरताज़ की बिन सर तिरंगें में लिपटी मिली हैं।
--सीरवी प्रकाश पंवार
मंगलवार, 9 मई 2017
खूबसूरत सा चंदा धुंए .....
खूबसूरत सा चंदा धुंए की ख़ातिर अड़ा हैं,
कुदरत का करिश्मा देख़ो रूह पर आकर जुड़ा हैं,
जो धुँआ खुद ना टिक सके, उसे मै क्या हटाऊँ,
आंखिर भींगी पलकों का अड्डा सड़कों के किनारे खड़ा हैं।
-सीरवी प्रकाश पंवार
रविवार, 7 मई 2017
मज़ाक़
साहब मज़ाक, आप को यह मज़ाक लगता हैं,
बहनों की इज़्ज़त करना आपको बक़वास लगता हैं,
सोचों अगर कल तुम्हारा कोई अपना हुआ तो क्या करोगे,
पर साहब इस सदी में आपको अपने पराये लगते हैं।
--सीरवी प्रकाश पंवार
ना चला अग़र..
ना चला अग़र मै तो क्या मेरी राह बन जाओंगे तुम,
ना लिखा पल भर अग़र मै तो क्या अनपढ़ ठहरा दोंगे तुम,
मै नील गगन में बादल की लकीरों से इतिहास तुम्हारा उकेर दूंगा,
तुम्हे ना मिला अग़र कोई तो क्या मुझे ही ज़रिया बना लोगे तुम।
--सीरवी प्रकाश पंवार
शुक्रवार, 5 मई 2017
ये आज कल की तलवारे...
ये तलवारे क्या वज़ूद रखती मेरी इन लड़ाइयों के आगे,
ये आज कल कि दुकानें क्या वज़ूद रखती मेरी इन भूखों के आगे,
तुम जो खेल रच कर अक़्सर शराब पर आ जाते हो,
आख़िर वो शराब क्या वज़ूद रखती मेरे इन ज़ख्मो आगे।
--सीरवी प्रकाश पंवार