शुक्रवार, 16 जून 2017

टुटा अग़र कही तो ....

टुटा अग़र कही तो तेरे लफ़्ज़ सुन दोड़ आया,
बिखरा अगर कही तो तेरी तस्वीर देख जोड़ पाया,
बस लफ्ज़ो की कहानी को एक नया नाम दूँ,
जो नाम देने आया तो शब्द कही भूल आया।
--सीरवी प्रकाश पंवार

जोरों की हैं...

     "जोरो की हैं.."

रातो के इन सायों में जो तुम,
भूत बन नजर आते हो,
लगता हैं बदलते वक्त की हवा,
वक्त के पहले जोरों की हैं।

अक़्सर इश्क के दौर में जो तुम,
पागल बन नज़र आते हो,
लगता हैं इन शहरों की सड़कों पर,
नंगो की आवाजाही जोरों की हैं।

फिर सूरज बन बादल में छुपते नज़र आते हो तुम,
महफ़िल का मंझर बन उभर आते हो,
लगता हैं सड़को के इन इश्क़बाजो कि,
महफ़िलों में आवाम जोरों की हैं।
--सीरवी प्रकाश पंवार

दो रत्न क्या जड़ दिए...

दो रत्न क्या जड़ दिए हुस्न में,
ये तो खुद को मुमताज़ समझ बैठे...
कागजों के बीच दो खोटे सिक्के का बजने से,
ये तो खुद को जिस्म के मोहताज कर बैठे...
आंखिर ये जो बेवजूद जीते इन लोगो से,
जीने की इक वज़ह तो पूँछु...
जो पल भर लकीरें क्या गढ़ ली चेहरे पर,
ये तो हर घर की चौखट समझ बैठे...

जब दो शब्द क्या लिख लिए व्यंग्य के,
ये तो खुद को बेउम्र मासूस समझ बैठे...
आंखिर वो जी भी कर क्या कर लेंगे,
जो खुद को सुबह का अख़बार समझ बैठे....
मै तो था ही अज़ीब पैदा होने से ही,
बेवज़ह तुम तो मुझे अलग समझ रहे हो...
आंखिर क्या वज़ूद रखती ये लकीरे मेरे आगे,
जो तुम लोग मुझे इनका मोहताज़ कर बेठे।
--सीरवी प्रकाश पंवार

गुरुवार, 15 जून 2017

हीरो की चमक आजकल .....

हीरो की चमक आजकल रहने कहा दी,
परिंदों को उड़ाने आंखिर उड़ने कहा दी,
जो घर-घर फर्जी परिंदों के घरौंदे बनाए बैठे हो,
रूह पर कपडे की रौनक रहने कहा दी।
--सीरवी प्रकाश पंवार

शुक्रवार, 9 जून 2017

तुम दो फ़लक..

तुम दो फ़लक ख़त के लिख कर यू ही मत बिख़र जाना,
तुम उम्मीद बने हो किसी की यू ही मत टूट जाना,
न मिला अग़र कुछ भी फिर वो माँ तो पास रहेंगी तेरे,
तुझे जीना हैं अपनों के लिए यू ही मत रूठ जाना।
--सीरवी प्रकाश पंवार
This is a crime on your parents.

बेवज़ह सोये..

बेवजह सोये पंछी को छेड़ा नहीं जाता,
ना मिले अग़र कुछ भी तो रोया नहीं जाता,
आंखिर वो वजूद ही क्या रखता जो न हो हमारा,
जो न ढूंढे किसी को तो पाया भी नहीं जाता।
--सीरवी प्रकाश पंवार

सोमवार, 5 जून 2017

हाथों की लकीरों में...

अक़्सर हाथों की लकीरों में जो ख़ुद को ढूंढा करता हूँ,
जो रूप गढ़ा था एक अबला ने उसे बनाया करता हूँ,
मुझे बस मोहलत मत देना ख़ुदा की ख़ुद के हाथों मौत लिख लू,
उन लकीरों में ख़ुद को पाकर अक़्सर पराया समझता हूँ।
--सीरवी प्रकाश पंवार

रविवार, 4 जून 2017

कभी पढ़ लिया.....

कभी हस लिया करता हूँ खुद को आईने में देख कर,
कभी पढ़ लिया करता हूँ खुद को अकेला देख कर,
यह दो पल की चीजें आंखिर कब पूरी होंगी,
कभी रो भी लिया करता हूँ हाथो की लकीरें देख कर।
--सीरवी प्रकाश पंवार