मंगलवार, 20 जून 2017

असामंजस्य 2

मै रात भर नहीं सोया कि कोई शिक़वा गीला ना हो,
मै रात भर नहीं रोया कि कोई अल्फ़ाज भीगा ना हो,
जब डोरे(राखी) की गाँठ तोड़ कर सुई(इश्क़) में पिरोया हो,
तब मै रात भर नहीं लिखा कि वो गर्भ(माँ) शर्मिन्दा ना हो।
--सीरवी प्रकाश पंवार

सोमवार, 19 जून 2017

असामंजस्य part 1

सपनों ही सपनों में एक ग़ज़ब सा खेल रच गया,
आँखों की उलझनों में हाथों का धागा(राखी) खो गया,
अग़र लिख लिए दो अल्फ़ाज तो माँ शर्मिन्दा हो जाएंगी,
अग़र न लिखा अल्फ़ाज तो समझों कलम से अनर्थ हो गया।
--सीरवी प्रकाश पंवार

शनिवार, 17 जून 2017

एक टुक भी ऐसा कहा .......

एक टुक भी ऐसा कहा कि ज़मी दिल की हिला डाली,
एक पल भी ऐसा गढ़ा कि सोचने की मनाही कर डाली,
आंखिर बातों की सच्चाई क्या वज़ूद रखेंगी मेरे सामने,
पर वज़ह भी ऐसी दी कि ज़मी पैर की हिला डाली।
--सीरवी प्रकाश पंवार
For dear cute

शुक्रवार, 16 जून 2017

ख़बर हो तुझको....

ख़बर हो तुमको की बेखबर हूँ तुझसे,
मालूम हो तुझको की दूर हूँ तुझसे,
जो दूर रख कर जो पास रखती हो मुझको,
प्रतीत हो तुझको की पागल हूँ तुझसे।
--सीरवी प्रकाश पंवार

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दो लफ़्ज़ क्या लिख...

दो लफ़्ज़ क्या लिख दिए उस फूल के,
ये तो महफ़िलों के मोहताज़ कर ही गए....
दो कदम क्या बढ़ा दिए उसे उठाने के,
ये तो शरीरों के रंग चढ़ा कर ही गए.....
मैरी जिंदगी तो पहले से मुक्कमल हैं साहब,
मै क्या रंग चढ़ाऊँ इन दिलों के.....
दो पल क्या गुजार लिए मुस्कुराहट के,
ये तो इश्क की छाप दिलो पर छोड़ गए...।
--सीरवी प्रकाश पंवार

टुटा अग़र कही तो ....

टुटा अग़र कही तो तेरे लफ़्ज़ सुन दोड़ आया,
बिखरा अगर कही तो तेरी तस्वीर देख जोड़ पाया,
बस लफ्ज़ो की कहानी को एक नया नाम दूँ,
जो नाम देने आया तो शब्द कही भूल आया।
--सीरवी प्रकाश पंवार

जोरों की हैं...

     "जोरो की हैं.."

रातो के इन सायों में जो तुम,
भूत बन नजर आते हो,
लगता हैं बदलते वक्त की हवा,
वक्त के पहले जोरों की हैं।

अक़्सर इश्क के दौर में जो तुम,
पागल बन नज़र आते हो,
लगता हैं इन शहरों की सड़कों पर,
नंगो की आवाजाही जोरों की हैं।

फिर सूरज बन बादल में छुपते नज़र आते हो तुम,
महफ़िल का मंझर बन उभर आते हो,
लगता हैं सड़को के इन इश्क़बाजो कि,
महफ़िलों में आवाम जोरों की हैं।
--सीरवी प्रकाश पंवार

दो रत्न क्या जड़ दिए...

दो रत्न क्या जड़ दिए हुस्न में,
ये तो खुद को मुमताज़ समझ बैठे...
कागजों के बीच दो खोटे सिक्के का बजने से,
ये तो खुद को जिस्म के मोहताज कर बैठे...
आंखिर ये जो बेवजूद जीते इन लोगो से,
जीने की इक वज़ह तो पूँछु...
जो पल भर लकीरें क्या गढ़ ली चेहरे पर,
ये तो हर घर की चौखट समझ बैठे...

जब दो शब्द क्या लिख लिए व्यंग्य के,
ये तो खुद को बेउम्र मासूस समझ बैठे...
आंखिर वो जी भी कर क्या कर लेंगे,
जो खुद को सुबह का अख़बार समझ बैठे....
मै तो था ही अज़ीब पैदा होने से ही,
बेवज़ह तुम तो मुझे अलग समझ रहे हो...
आंखिर क्या वज़ूद रखती ये लकीरे मेरे आगे,
जो तुम लोग मुझे इनका मोहताज़ कर बेठे।
--सीरवी प्रकाश पंवार