कभी जीत के समंदर का एक लौटा तक नहीं चुराया,
भूखा सोया प्यासा भागा अश्क़ तक नहीं गिराया,
अरे तुम्हे मेरी जीत मुकम्मल क्यों नहीं होती,
पर कभी जीत की ख़ुशी में एक दीप तक नहीं जलाया।
--सीरवी प्रकाश पंवार
मंगलवार, 11 अप्रैल 2017
कभी जीत के....
रविवार, 9 अप्रैल 2017
जो गीत....
जो गीत कागजो में नहीं था वो एक बूँद से बिख़र गया,
जो धागे रूह तक नहीं था वो एक शब्द से टूट गया,
फिर तो हरकतों को मेरे ही हवाले किया जाना था,
क्योकि जो हक़ीक़त में नहीं था उसे हरकतों में लाया गया.
-सीरवी प्रकाश पंवार
शनिवार, 8 अप्रैल 2017
मोहब्बत की दीवारे...
मोहब्बत की दीवारों में ज़मानत कहा खो गयी,
तेरी अल्फाज़ो की रातों में नाराजगी कही खो गयी,
मेरे से बेवफ़ाई की वजह मत उगलवा,
देख तेरी जिंदगी हवालात की कैसे हो गयी।
--सीरवी प्रकाश पंवार
शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017
हम इतने महशूर
हम इतने महशूर भी नहीं कि अखबारो की आवाज़ बने,
इतने इश्क़बाज भी नहीं कि तेरे दिल की जमीं बने,
तुम फस गयी हो इश्क़ के बाजारवाद की दुनिया में,
पर हम इतने मोहताज़ भी नहीं कि खड़े ना हो सके।
--सीरवी प्रकाश पंवार
गुरुवार, 6 अप्रैल 2017
तेरी जिंदगी की मौत से मुलाक़ात....
एक लफ्ज़ रूह से बोल रहा कि क्या जीना लिखा उसमें,
जिसने तुझे जीने का दूसरा सहारा बनाया उसने,
अरे वो हुस्न की मारी पर तू तो इश्क़ का मारा हैं,
तेरी जिंदगी की मौत से मुलाक़ात करा दी उसने।
तेरी माँ की दुआ का मज़ाक बना दिया उसने,
तू सोच नहीं पाया सब कुछ तेरा छीन लिया उसने,
अरे वो बेवफ़ाओ की रानी तू मासूम सा बच्चा,
तेरी ही मासूम हरकतों को बेवफ़ाई का ज़रिया बना दिया उसने।
--सीरवी प्रकाश पंवार
बुधवार, 5 अप्रैल 2017
कोई अल्फ़ाज जुड़ा....
कोई अल्फ़ाज जुड़ा था तुझसे जो गीत बन गुनगुना रहा हैं,
कोई अश्क़ जुड़ा था तुझसे जो इश्क़ बन बह रहा हैं,
आँखों में तेरा एक राज लिखा था जो तू चुरा रही हैं,
पर एक हुस्न जुड़ा था तुझसे जो कही टूट कर तड़प रहा हैं।
--सीरवी प्रकाश पंवार
गुरुवार, 30 मार्च 2017
ऐ खुदा मेरे पलड़े में मौत लिख दे
ऐ खुदा मेरे पलड़े में मौत लिख दे,
या मेरी किस्मत का नया आयाम गढ़ दे,
कल भी हारा था आज भी हारा हूँ,
मेरी किस्मत में बस एक जीत लिख दे,
पलकों को कभी जपकया तक नहीं,
फिर यह आँखों के सामने दीवार क्यों?
दिल कभी किसी का दुखाया तक नहीं,
फिर यह आँखों में खालीपन का अहसास क्यों?
अश्क़ हर पल यही पूछते मेरे से कि,
सब कुछ किया भूला कुछ भी नहीं,
फिर भी इन आँखों में वो उम्मीद क्यों?
--सीरवी प्रकाश पंवार
शनिवार, 18 मार्च 2017
एक गीत रचा हैं मैने....
एक गीत रचा हैं मैने........
एक गीत सुना हैं तूने..........
फिर याद मेरी यू आई,
आँखों से आँसू निकला,
एक गीत रचा हैं मैने...............
वो दिन क्या याद हैं तुझको,
आँखों से मिलन हुए थे,
वो दिन क्या याद हैं तुझको,
जी भर हस कर रोए थे,
जब बात आई अपनों की,
मेने तोड़ा था बंधन पुराना,
एक गीत रचा हैं मैने.......................
एक बात तू याद रखना,
हाथों में हाथ ना दिखेंगे,
एक पल तू याद रखना,
अब बात ना तेरी करेंगे,
तेरी इस बेवफाई को,
मै जन्म-जन्म न भूलूँगा
एक गीत रचा हैं मैने.................
--सीरवी प्रकाश पंवार
शनिवार, 4 मार्च 2017
जरूरी नहीं था ........
ज़रूरी नहीं था की दुनिया के रंग देखूँ,
ज़िगर का टुकड़ा बनाना भी ज़रूरी नहीं था,
बस ज़रूरी था की तेरे गर्भ में पल भर रहूँ,
वैसे तो बेटी कहना भी तो ज़रूरी नहीं था,
सही कहाँ है किसी ने की किस्मत खुदा के हाथ में,
मेरा खुदा भी तू और जीना भी तेरे हाथ में,
शायद मेने जहाँ के रंग कुछ पहले छेड़ दिए होंगे,
कि रंग देखने के पहले तूने ज़मी में दफ़ना दिया।
शायद खुदा होने नाते माँ तूने मेरा भविष्य देखा होंगा,
कभी लकीरों की आड़ में तो कभी दुष्कर्म की आड़ में जला होंगा,
मान लुंगी माँ लकीरों के आगे तेरी भी मज़बूरी रही होंगी,
फिर भी माँ लकीरों की आड़ में तो भरोसा जलाया होंगा।
--सीरवी प्रकाश पंवार